|| गिरिराज का बृजमण्डल में आगमन ||
परिचय - श्री राधा रानी के कहने पर श्री हरि ने अपने धाम से चौरासी कोस विस्तृत्त भूमि, गोवर्धन पर्वत, और यमुना नदी भूतल पर भेजा | गोवर्धन ने पश्चिम दिशा में शमलीदीप के भीतर द्रोणाचल की पत्नी के गर्भ में जन्म लिया हिमालय और सुमेरु आदि पर्वतों ने आकर गोवर्धन की पूजा व परिक्रमा की इसलिये गोवर्धन को गिरिराज कहा जाता है |
गिरिराज के भव्य ,मनोहर रूप को देख कर मुनि पुलत्स्य भाव विभोर हो गए मुनि पुलत्स्य के मन में पर्वत को प्राप्त करने की इच्छा हुई इसलिए वे द्रोणाचल के समीप गए | द्रोणाचल ने उनका पूजन,स्वागत और सत्कार किया
मुनि पुलत्स्य द्रोणाचल से कहा -
द्रोणाचल तुम पर्वतो के स्वामी हो ,सभी देवता तुम्हारा आदर करते है,तुम दिव्य औषधियों का भंडार हो जो मानव जीवन देती है| "मै काशी का निवासी मुनि हूँ | तुम्हारे द्वार पर याचक बनकर आया हूँ | तुम अपने पुत्र गोवर्धन मुझे दे दो | भगवान शिव की नगरी "काशी "जहाँ मरणोपरांत तुरंत मोक्ष मिलता हैं वहाँ गंगा नदी है।,मैं तुम्हारे पुत्र को वही स्थपित करुँगा |
वृक्षों से भरा तुम्हारा पुत्र है मैं उस पर तपस्या करुँगा |
पुलत्स्य की बात सुनकर द्रोणाचल के नेत्रों में आँसू आ गए | परन्तु श्राप के डर से गिरिराज को मुनि के हाथ सौंप दिया |
गोवर्धन ने कहा -"मुनि!मेरा शरीर आठ योजन लंबा ,दो सौ योजन चौड़ा हैं | ऐसे में आप मझे कैसे ले जा पाएँगे | "
पुलत्स्य जी बोले -बेटा ! तुम मेरे हाथ पर बैठ कर काशी चलो |
गोवर्धन बोले - मुनि ! मेरी एक प्रतिज्ञा है |आप जहाँ कही मुझे एक बार रख देगें | मैं वही स्थपित हो जाऊंगा |
पुलत्स्य जी बोले - मैं तुम्हे शाल्मलीद्वीप से लेकर भारत के कौशल देश तक कही नहीं रखूँगा यह मेरी प्रतिज्ञा हैं |
तभी गिरिराज पिता को आँसू भरे नेत्रों से प्रणाम कर मुनि की हथेली पर बैठ गये | मुनि लोगो को अपना तेज दिखाते हुए बृज -मण्डल आ गए | बृज में आते ही गोवर्धन को अपने पूर्व जन्म की बातें याद आ गई | मन -ही -मन गोवर्धन ने सोचा -यह बृज में त्रिलोकी नाथ भगवान श्री कृष्ण जन्म लगे यहाँ बाल लीला ,किशोर लीला ,दान लीला और मान लीला करेंगे | बृज भूमि और यमुना जी गोलोक से श्री कृष्णा और राधा जी के सुभागमन के लिए आये हैं | यह सोचकर गोवर्धन ने मुनि की हथेली पर भार बहुत अधिक बड़ा दिया
मुनि पहले से ही थके हुए थे, पहले की कही बात भूल गए |पर्वत को हथेली से उतार कर बृज -मण्डल में रख दिया | भार से पीड़ित मुनि लघुशंका और स्नान करने के बाद आये उन्होंने कहा-उत्तम पर्वत उठो | कई बार कहने के बाद जब गोवर्धन टस से मस न हुआ तो मुनि बोले - गिरीश्रेस्ठ उठो और भार न बढाओ नहीं तो मैं तुम्हे श्राप दे दूँगा |
गोवर्धन बोले -मुनि ! मेरा कोई दोष नहीं है आप ने ही मुझे यह स्थापित किया है मैने प्रतिज्ञा की थी जहाँ आप रहोगे वहाँ से नहीं उठूँगा |
पुलत्स्य मुनि को गुस्सा आए गया और उन्होंने श्राप दिया -पर्वत तू तो बहुत ढीठ है | तूने मेरा मनोरथ पूरा नहीं किया इसलिये तू प्रतिदिन तिल -तिल करके शीर्ण होगा | ऐसा कहकर मुनि काशी लौट गए उसी दिन से गोवर्धन प्रतिदिन तिल तिल करके शीर्ण हो रहा है |
जब तक गंगा और गोवर्धन पर्वत हैं कलियुग का प्रभाव नहीं बढ़ेगा | गोवर्धन का यह चरित्र बड़े से बड़े पाप का नाश करने वाला और मोक्ष देने वाला है | || जय श्री कृष्णा || || जय गोवर्धन ||
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